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प्रचण्ड कम्युनिष्ट शासनतर्फ अग्रसर,ओली भारतसँग नजिक : भाजपाकाे विश्लेषण


२०७७, मंसिर २१, आइतबार

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ललितपुर  । भारतीय सत्तारुढ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)ले नेपालको राजनीतिक अवस्थाका विषयमा आफ्नो धारणा सार्वजनिक गरेको छ । भाजपाको मातृ संगठन राष्ट्रिय स्वयम् सेवक संघ (आरएसएस)ले आफ्नो मुखपत्र ‘पाञ्चजन्य’मा नेपालको राजनीतिक घटनाक्रमका विषयमा विश्लेषण गरिएको छ । पाञ्चजन्यलाई भाजपाकै मुखपत्रकोरुपमा लिने गरिन्छ । भाजपाले आफ्नो राजनीतिक विचार यहीँ मुखपत्रबाट सार्वजनिक गर्ने गरेको छ ।

भारतमा आरएसएस अन्तरगत नै भारतीय जनता पार्टी क्रियाशील हुन्छ । एक सय भन्दा धेरै संगठनमध्ये भाजपा पनि एक हो । भाजपालाई आरएसएसले नै नियन्त्रण गर्छ । भाजपाले गर्ने हरेक निर्णय पहिले आरएसएसबाट पारि भएर आउने गरिन्छ । त्यतीमात्र होइन, भाजपाको महासचिव पद् पनि आरएसएसबाटै चयन हुने गरेको छ । भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी आरएसएसका प्रचारक हुन् । नेपालको राजनीतिका विषयमा लेखक रहेका पंकज दास पनि आरएसएसका प्रचारक हुन् । भाजपाका लागि यो मुखपत्रमा उल्लेख गरिएका कुरा मार्गदर्शक बन्ने गरेको छ ।

हालै प्रकाशित मुखपत्रमा ‘चीन के चगुंल मे नेपाल की राजनीति’ शीर्षकमा नेपालको राजनीतिका विषयमा काठमाडौं आएर पंकज दासले विश्लेषण गरेको उल्लेख छ । लेखमा नेपालको राजनीति चीनको नियन्त्रणमा रहेको दावी गरिएको छ । लेखमा प्रधानमन्त्रीसमेत रहेका नेकपा अध्यक्ष केपी शर्मा ओली भारततर्फ ढल्केको उल्लेख गरिएको छ भने नेकपाका कार्यकारी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ कम्युनिष्ट शासन स्थापना गरेर नेपालको प्रथम प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति बन्ने दाउमा रहेको उल्लेख छ ।

नेपालमा प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपतिको व्यवस्थाका लागि संविधान संशोधन गर्न दुई तिहाइ बहुमतको आवश्यकता पर्नेमा १५ जना सांसद नेकपालाई अपुग हुने भएकाले प्रचण्डकै योजनामा उपेन्द्र यादव नेतृत्वको तत्कालीन संघीय समाजवादी फोरम नेपाललाई सरकारमा सहभागी गराइएको कुरा लेखमा लेखिएको छ । मुखपत्रले प्रचण्डकै योजनामा समाजवादी र नयाँशक्तिबीच एकता भएको दावी गरेको छ ।

चीनले नेपालमा साइलेन्ट डिप्लोमेसी गरिरहेको उल्लेखगर्दै मुखपत्रमा राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारीले चिनियाँ योजनालाई अस्वीकार गरेको र प्रधानमन्त्री ओली पनि भण्डारीकै पक्षमा रहेको मुखपत्रमा उल्लेख छ । त्यहीँ बलमा प्रचण्डविरुद्ध ओली लडिरहेको दाबी गरिएको छ । मुखपत्रमा ओलीकै अगुवाइमा नेपाल र भारतबीच राम्रो सम्बन्ध स्थापना भइरहेको तर, प्रचण्डले यो कुरा पचाउन नसकेको पनि निष्कर्ष भाजपाको छ । नेकपा विभाजनका लागि चीनले आफ्नो रक्षामन्त्री नेपाल भ्रमणमा पठाएको जनाइएको छ ।

हेर्नुस् लेखको हिन्दी संस्करण
वामपंथ की तरह ही नेपाल में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की अंदरूनी राजनीति के दो चेहरे हैं। बाहर से देखने पर भले ही लगे कि कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) का आंतरिक संघर्ष सत्ता हासिल करने के लिए है। पर इसके पीछे एक और चेहरा है, जिसे पहचानना बहुत जरूरी है। नेपाल में नया संविधान लागू होने के बाद हुए पहले आम चुनाव में वाम दलों के गठबंधन को करीब दो तिहाई बहुमत मिला। लेकिन दो साल में ऐसा क्या हुआ कि पार्टी में टूट की नौबत आ गई? क्यों कर पार्टी के दो शीर्ष नेता एक-दूसरे पर खुलेआम आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे? दल में वैमनस्यता इतनी बढ़ गई कि दो गुटों की झड़प में पार्टी इकाई सचिव की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। हत्या का आरोपी सत्तारूढ़ पार्टी के विरोधी गुट का एक नेता व पूर्व सांसद है। सभा सम्मेलन में विरोधी गुट की नारेबाजी, काले झंडे दिखाना तो आम बात है। इसके पीछे के मूल कारण को समझने के लिए नेकपा के चुनावी घोषणापत्र के एक बिंदु पर ध्यान देना होगा, जिसे महत्वहीन समझा गया।
नए संविधान के लागू होने के बाद आम चुनाव से पहले नेपाल में दो वामपंथी पार्टियां थीं। पहली, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत माले) जिसे नेकपा (एमाले) नाम से जाना जाता था। इसके अध्यक्ष के.पी. शर्मा ओली थे। दूसरी थी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी), जिसके अध्यक्ष पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ थे। दोनों नेताओं ने साथ चुनाव लड़ने और चुनाव के बाद पार्टी एकीकरण के लिए समझौता किया। हालांकि इस समझौते में देश की शासन व्यवस्था को लेकर मतभेद कायम रहा। दोनों नेता इस बात पर सहमति के बाद आगे बढ़े कि चुनाव के बाद पार्टी के महाधिवेशन में मतभेद का निबटारा हो जाएगा। ओली के नेतृत्व वाली एमाले देश में बहुदलीय जनवाद के सिद्धांत व संसदीय प्रणाली, संसद के प्रति उत्तरदायी प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की समर्थक है। वहीं, प्रचंड की अगुआई वाली माओवादी पार्टी चीन की तर्ज पर जनता का जनवादी सिद्धांत, प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति शासन प्रणाली व चीन की ही तर्ज पर एकदलीय शासन व्यवस्था की पैरोकार है। सत्तारूढ़ दल में मौजूदा विवाद इसी वजह से है। प्रचंड नेपाल के प्रथम प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं। इसलिए उनकी सारी कोशिश इसी बात पर केंद्रित है कि कैसे संविधान में संशोधन किया जाए ताकि बहुदलीय व्यवस्था खत्म कर देश में एकदलीय शासन प्रणाली को लागू किया जा सके।
आम चुनाव में नेकपा को भारी बहुमत मिलने के बाद प्रचंड ने अपनी योजना पर काम शुरू कर दिया। संविधान में संशोधन के लिए सत्तारूढ़ दल को दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी, लेकिन 15 सांसद कम थे। लिहाजा प्रचंड ने ओली की इच्छा के विरुद्ध अपने करीबी पूर्व माओवादी नेता एवं तत्कालीन संघीय समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र यादव को सरकार में शामिल किया। फिर अपने पूर्व सहकर्मी, पूर्व माओवादी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. बाबूराम भट्टराई को उपेंद्र की पार्टी में शामिल करा दिया ताकि संविधान में संशोधन किया जा सके। इसके बाद प्रचंड प्रधानमंत्री ओली पर संविधान में संशोधन के लिए दबाव डालने के साथ राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करने की सीमा को 5 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत करने पर जोर देने लगे ताकि देश में केवल दो ही दल रहें- एक कम्युनिस्ट तथा दूसरा नेपाली कांग्रेस। संविधान में संशोधन कर प्रचंड राष्ट्रपति बनने के इच्छुक हैं ताकि सत्ता पर उनका पूरा नियंत्रण रहे। नेपाल की न्याय व्यवस्था में वामपंथियों का वर्चस्व इतना बढ़ गया है कि अगले तीन दशक तक कम्युनिस्ट पार्टी का ही कोई कार्यकर्ता प्रधान न्यायाधीश बनेगा। प्रचंड के लिए यह एक सुनहरा अवसर है, इसलिए उन्होंने सत्ता का नेतृत्व संभालने के अपने ही समझौते को ठुकरा दिया। प्रचंड ने पहले ओली को मनाने के लिए हरसंभव प्रयास किया, उन पर दबाव भी बनाया। जब ओली नहीं माने तो वे सरकार को बदनाम करने और उसे असफल साबित करने में जुट गए।
चीन की योजना
दरअसल, नेपाल में वामपंथी दलों का एकीकरण चीन की एक वृहत योजना का हिस्सा है। वह शुरू से ही नेपाल पर आधिपत्य जमाना चाहता था, पर भारत व नेपाल पर इसका प्रभाव, खुली सीमा की साझा विरासत, सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, पारिवारिक, राजनीतिक व कूटनीतिक संबंध इसमें सबसे बड़ी बाधा हैं। जब तक ये संबंध कमजोर नहीं होते, नेपाल में चीन की कोई चालाकी नहीं चलेगी। इसलिए चीन ने सुनियोजित तरीके से नेपाल के वामपंथी दलों व उनके शीर्ष नेताओं को भारत सरकार, नीति निर्माताओं व नेपाल में प्रभाव रखने वाली भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के करीब जाने और उन्हें विश्वास में लेकर अपना काम निकालने दिया। इसमें नेपाल के वामपंथी नेताओं, भारत के तत्कालीन सत्ता के गलियारों में दखल रखने वाले कथित वामपंथी बुद्धिजीवियों, स्तंभकारों, पत्रकारों एवं जेएनयू के शिक्षकों की भूमिका अहम रही। दिल्ली के साउथ ब्लॉक में बैठने वाले अधिकांश बाबू यह समझ ही नहीं पाए कि नेपाल के वामपंथी नेता बार-बार उनके पास क्यों आ रहे हैं? चाहे वे प्रधानमंत्री ओली हों या पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड, माधव नेपाल या भट्टराई, किसी समय ये सभी रॉ के करीब थे। एक दशक पूर्व कही गई एक बात आज अक्षरश: सही साबित हो रहीहै। जब-जब भारत को इनके सहयोग या समर्थन की जरूरत पड़ी, तब-तब इन्होंने उसे धोखा दिया। 
कहा जाता है कि नेपाल में चीन ‘साइलेन्ट डिप्लोमेसी’ (मूक कूटनीति) करता है। लेकिन वह परदे के पीछे अपनी शातिर चाल जारी रखता है। चीन शुरू से ही नेपाल में भारत विरोधी राष्ट्रवाद को हवा देता रहा है। पहले उसने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के जरिए यह काम किया, पर जब से नेपाल में यह कमजोर हुई, चीन खुलकर सामने आ गया। नेपाल में भारत विरोधी माहौल को हवा दे उसने दोनों वामपंथी दलों का चुनावी गठबंधन करा दिया। इस सत्तारूढ़ वामपंथी सरकार के जरिए चीन अपने उद्देश्य में कामयाब रहा तथा भारत के साथ नेपाल के हर संबंध पर प्रहार किया जाने लगा। बिम्सटेक सम्मेलन में घोषणा के बावजूद नेपाली सेना को भारत में होने वाले बिम्सटेक देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यास से दूर रखना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा क्षेत्रीय मुक्त व्यापार व परिवहन को बढ़ावा देने के लिए बीबीआईएन (बांग्लादेश, भूटान, इंडिया, नेपाल) की परिकल्पना पर असहयोग कर रिश्तों में खटास लाने का प्रयास हुआ। भारत के सुझाव के बावजूद चीन की महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड पर हस्ताक्षर कर नेपाल ने भारत की सुरक्षा को चुनौती देने की कोशिश की। भारत के साथ बेवजह सीमा विवाद खड़ा कर कूटनीतिक संबंधों में दरार, कोरोना महामारी की आड़ में खुली सीमा को बंद कर, भगवान् श्रीराम के जन्मस्थल को लेकर विवादित बयान देकर और पशुपतिनाथ मंदिर के मूलभट्ट को बदलने का फैसला कर दोनों देशों के बीच धार्मिक, आध्यात्मिक और पारंपरिक संबंधों को बिगाड़ने के प्रयास हुए। नेपाल में ब्याही जाने वाली भारतीय बेटियों को नागरिकता के अधिकार से वंचित करने वाला कानून तो दोनों देशों के पारिवारिक संबंधों को ही खत्म करने की साजिश थी। वास्तव में नेपाल पर अपना प्रभुत्व जमाने व भारत-नेपाल रिश्तों में दरार पैदा करने के लिए चीन ने शांत कूटनीति की जगह आक्रामक कूटनीति अपनाई।
चीन का मकसद नेपाल में एकदलीय शासन व्यवस्था, अपनी तर्ज पर जनवादी गणतंत्र व्यवस्था स्थापित करने के साथ सभी राजनीतिक दलों पर अपना दबदबा कायम करना है। इसी के तहत पहले उसने नेकपा के साथ एक लिखित समझौता किया। इसके लिए प्रचंड ने एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया था जिसमें पार्टी के विदेश विभाग प्रमुख माधव नेपाल ने सक्रियता दिखाई। प्रधानमंत्री ओली इसमें मुख्य अतिथि थे। इसी कार्यक्रम में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के विदेश विभाग प्रमुख सांग तांग व नेपाल में चीन की राजदूत होउ यांकी को साक्षी मानकर दोनों देशों की कम्युनिस्ट पार्टियां के बीच सहयोग, अनुभव को साझा करने, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की विचारधारा का अवलंबन करने व चीन की ही तर्ज पर शासन व्यवस्था को अपनाने जैसे बिंदुओं पर हस्ताक्षर किए गए। इसी के साथ नेपाल में चीनी राजदूत की अस्वाभाविक सक्रियता बढ़ गई— नेपाल के सत्तारूढ़ दल में ही नहीं, बल्कि सरकार के मंत्रालयों और विभागों में भी। आए दिन यांकी या तो पार्टी के किसी शीर्ष नेता के घर पर होतीं या किसी मंत्रालय में दिखतीं। कूटनीति की सारी सीमाओं को लांघते हुए यांकी का प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति आवास पर बेरोक-टोक आना-जाना सबको अखरने लगा। जब नेपाली मीडिया ने इस पर सवाल उठाना शुरू किया तो धमकी भरे लहजे में विज्ञप्तियां जारी की जाने लगीं। चीनी राजदूत का सरकार पर प्रभाव इतना बढ़ गया कि सीमा विवाद पर नेपाली विदेश मंत्रालय व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली वही सब बात बोलने लगे जो कि उन्हें चीनी राजदूत की तरफ से कहीं जाती थीं। सरकारी निकाय के प्रामाणिक दस्तावेजों के बावजूद ज्ञवाली ने संसद में बयान दिया कि चीन के साथ नेपाल का सीमा विवाद नहीं है और उसकी एक इंच जमीन पर भी उसकी कब्जा नहीं है। इस तरह की कई घटनाएं हुर्इं, जिससे आम जनता को भी यह लगने लगा कि चीन या चीनी राजदूत ऐसा बर्ताव कर रहे हैं, जैसे नेपाल चीन का एक हिस्सा हो। लिहाजा, नेपाल में चीन के विरुद्ध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया।
भारत से बिगड़ते संबंधों के बीच चीन ने नेपाली राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व प्रचंड सहित कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। शासन व्यवस्था, संसदीय व्यवस्था व निर्वाचन प्रणाली में बदलाव के लिए प्रचंड व ओली के बीच कई बार बातचीत हुई। लेकिन एमाले नेताओं को यह मंजूर नहीं था। राष्ट्रपति विद्या भंडारी ने, जो एमाले की प्रभावशाली नेता रही हैं और पार्टी में अभी भी उनका काफी प्रभाव है, शासन व्यवस्था के चीनी मॉडल को अपनाने से इनकार कर दिया। ओली को भी इससे बल मिला और उन्होंने अन्य मुद्दों पर प्रचंड से समझौते के बावजूद बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था, संसदीय प्रणाली को छोड़ने से साफ मना कर दिया। इसके बाद देशभर में एमाले के नेता व कार्यकर्ता लामबंद होने लगे और चीन की योजना पर पानी फिरने लगा। इससे चीन नाराज हो गया और उसकी शह पर प्रचंड ने ओली पर आरोपों की झड़ी लगा दी और उनसे इस्तीफा मांगा जाने लगा। तब ओली ने भी पार्टी के भीतर अपने विरोधियों को करारा जवाब देना शुरू किया।
प्रचंड ने भट्टराई को उपेंद्र यादव की पार्टी में शामिल करने के लिए जेएनयू के संपर्क सूत्र के जरिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में नेपाल मामलों के प्रभारी एक वरिष्ठ अधिकारी को यह भरोसा दिलाया कि बाबूराम अगर उपेंद्र की पार्टी में शामिल हो जाते हैं तो इससे ओली कमजोर पड़ जाएंगे और उन्हें अपदस्थ करना आसान हो जाएगा। उस समय तक सीमा विवाद में नेपाल सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से भारतीय विदेश मंत्रालय, रॉ व सरकार की काठमांडू में एक नकारात्मक छवि बन गई थी। लेकिन भारतीय अधिकारी न तो प्रचंड की इस चाल को समझ पाए और न नेपाल में हुए भारत विरोधी प्रदर्शनों के पीछे की सच्चाई का विश्लेषण कर पाए। इसका फायदा उठा प्रचंड भारत में कांग्रेस व वाम गठबंधन के समय के अपने पुराने मित्रों के जरिए भारतीय नीति निर्माताओं को चकमा देने में सफल रहे।
चीन बखूबी जानता है कि अगर वह इस बार चूका तो आने वाले कई वर्षों तक नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी को फिर इतना बहुमत हासिल नहीं होगी। इसलिए वह हर हाल में ओली सरकार को अपदस्थ करना चाहता है। उधर प्रचंड अपने भरोसेमंद उपेंद्र यादव व पूर्व माओवादी मंत्रियों को सरकार से वापस बुलाकर ओली को पद छोड़ने के लिए मजबूर करना चाहते थे, लिहाजा उन्होंने मंत्रिमंडल में शामिल माओवादी नेताओं से साफ शब्दों में कहा कि आप मेरा साथ दीजिए या मंत्री पद से इस्तीफा। इसके बाद अधिकांश नेताओं ने उनके समक्ष समर्पण कर दिया। उधर, प्रचंड ने एक बार फिर दिल्ली को यह झूठा दिलासा देने की कोशिश की कि अगर उन्हें भारत का समर्थन मिला तो वे ओली को अपदस्थ कर सकते हैं। जब ओली को इसका पता चला तो उन्होंने प्रचंड को कमजोर करने के लिए रातोंरात दल विभाजन संबंधी एक अध्यादेश लाकर उनकी पार्टी के 60 प्रतिशत सांसदों को अलग करने का प्रयास किया।
इससे प्रचंड की समझ में आ गया कि अगर पार्टी का बंटवारा हुआ तो उनकी महत्वाकांक्षा कभी पूरी नहीं होगी। इसलिए चीन की सलाह पर उन्होंने एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और रॉ का इस्तेमाल किया और उपेंद्र यादव के सहयोग से ओली को मात देने में कामयाब रहे। इस बार दिल्ली ने भी बिना हालात का विश्लेषण किए प्रचंड पर भरोसा कर लिया, क्योंकि तब तक नेपाल में भारत विरोधी माहौल बनना शुरू हो चुका था।  चूंकि ओली सत्ता में हैं व भारत विरोधी प्रदर्शनों में प्रचंड व माधव नेपाल गुट के ही नेता-कार्यकर्ता शामिल थे, इसलिए बड़ी चालाकी से इसका सारा दोष ओली के सिर मढ़ दिया गया ताकि उनकी जगह प्रचंड को भारत का समर्थन मिले।  प्रचंड की ही योजना के अनुसार उपेंद्र और भट्टराई की पार्टी के विभाजन को न केवल रोका गया, बल्कि प्रचंड के कहने पर एक अन्य मधेशी दल राष्ट्रीय जनता पार्टी का उसमें विलय भी कराया गया। हालांकि दोनों ही विपरीत विचारधारा वाली पार्टियां था। इस विलय में जेएनयू के कुछ कथित वामपंथी बुद्धिजीवी, पत्रकार एवं खुफिया विभाग के पूर्व अधिकारी का सहयोग रहा। इन सबका आकलन वही था जो प्रचंड ने उनको बताया था।
दिल्ली के इस कदम से ओली बौखला गए। इसके बाद शुरू हुआ नक्शा प्रकरण, संविधान संशोधन, सीमा पर नाकाबंदी व वह सब काम हुआ जो नेपाल-भारत के अंदरूनी रिश्तों में आज तक नहीं था। चीन की यही इच्छा थी कि नेपाल सरकार हर वह कदम उठाए जो भारत को परेशान करे। वह इस चाल में काफी हद तक सफल रहा। फिर भी उसका असली एजेंडा पूरा नहीं हो पा रहा था, जिसमें ओली बाधक थे। तब प्रचंड की अगुआई में ओली के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोला गया ताकि वे दबाव में आकर सत्ता छोड़ दें। लेकिन ओली पद छोड़ने की बजाए ओली पार्टी विभाजन के लिए तैयार हो गए। पर नेकपा में विभाजन चीन को मंजूर नहीं है, क्योंकि पार्टी विभाजन हुआ तो नेपाल में कम्युनिस्ट सर्वसत्तावाद थोपने की उसकी योजना पूरी नहीं हो सकेगी। चीन ने प्रचंड के जरिए हर पैंतरा आजमाया, पर उसका हर दांव उलटा पड़ रहा है। पार्टी विवाद के चरम पर होने के बीच ही चीनी राजदूत यांकी ने प्रधानमंत्री निवास में जाकर ओली को सत्ता छोड़ने व प्रचंड को सत्ता सौंपने के साथ यह संदेश भी दिया कि बीजिंग को यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कि पार्टी का बंटवारा हो। पर अपने हठी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध ओली ने यांकी को उसी समय अपने निवास से ‘गेट आउट’ कहते हुए उन पर ‘पर्सना-नॉन-ग्राटा’ (अस्वीकार्य व्यक्ति) लगाकर वापस बीजिंग भेजने की धमकी दे डाली। यही नहीं, उन्होंने चीनी राजदूत के बार-बार राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री निवास, विभिन्न मंत्रालयों में चक्कर काटने और नेताओं के घर जाने पर भी पाबंदी लगा दी। इससे चीन का अपने राजदूत के जरिए नेपाल पर अप्रत्यक्ष शासन चलाने का सपना बुरी तरह टूट गया। 
चीन के साथ साथ ओली के बिगड़े संबंधों और भारत-नेपाल के बीच संबंधों में सुधार के प्रयास, चीन और प्रचंड दोनों के लिए सिरदर्द बन गए हैं। ओली ने पहल कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से टेलीफोन पर बात की जिससे संवादहीनता समाप्त हुई और औपचारिक-अनौपचारिक वार्ता का दौर शुरू हुआ। ओली ने इसी कड़ी में रॉ प्रमुख सामंत गोयल को बुलाकर गलतफहमी दूर की। फिर भारतीय सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवाणे को नेपाल आमंत्रित कर वर्षों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए उन्हें नेपाली सेना के प्रधान सेनापति की मानद पदवी प्रदान की। उधर 26-27 नवंबर को भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला का दौरा तथा दिसंबर मध्य तक दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक प्रस्तावित है।
बरसों की जद्दोजहद के बाद नेपाल पर अपनी बनाई हुई पकड़ को कमजोर होते देख चीन का छटपटाना स्वाभाविक है। यही कारण है कि उसने अचानक अपने रक्षा मंत्री को नेपाल भेजने का निर्णय लिया। 29 नवंबर को कुछ घंटों के लिए नेपाल पहुंचे चीनी रक्षा मंत्री फेंग होई उपप्रधानमंत्री के बाद पहले सबसे प्रभावशाली मंत्री माने जाते हैं। हालांकि नेपाल में अभी चीन के रक्षा मंत्री से न तो कोई द्विपक्षीय वार्ता होनी है और न ही रक्षा विभाग के साथ कोई समझौता। इस दौरे का एक ही उद्देश्य है, सत्तारूढ़ दल में विभाजन रोकना तथा नेपाल के शेष राजनीतिक दलों से संबंध बनाना। इसी दौरे की जानकारी देने के लिए बीते दिनों जब यांकी ने ओली से मुलाकात की थी तब इसके कई अर्थ निकाले गए थे। जिस राजदूत ने ओली को पदच्युत करने का आदेशात्मक सुझाव दिया था, उसी ने अब ओली सरकार को लगातार सहयोग देने का आश्वासन देते हुए पार्टी विभाजन नहीं करने का आग्रह किया। यही नहीं, यांकी ने प्रचंड से भी मुलाकात कर कहा कि किसी भी स्थिति में बीजिंग को पार्टी में टूट स्वीकार्य नहीं है। वह ऐसा कोई कदम न उठाएं जिससे ओली को पार्टी विभाजन का मौका मिले। लेकिन उसने ओली पर असक्षम, असफल और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने जैसे संगीन आरोप लगाए हैं।
देखना यह है कि चीन के रक्षा मंत्री के जाने के बाद ओली खुद पर लगे इन आरोपों का क्या जवाब देते हैं, क्योंकि पिछली बार जब पार्टी सचिवालय की बैठक में उन्होंने कहा था कि उन पर लगे एक-एक आरोप का जवाब दिया जाएगा।



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विश्व बक्सिङ संघ (आइबा) काे अध्यक्षमा उमार क्रेकलेभलाई निरन्तरता

काठमाडौं । अन्तर्राष्ट्रिय बक्सिङ संघ (आइबा)को अध्यक्षमा पुनः उमर क्रमलेभले नै निरन्तरता पाएका छन् । यसअघि मे १३–१४ मा टर्कीको इस्तानबुलमा सम्बन्न आइबाको विशेष साधारण सभाबाट उमार अध्यक्ष पदमा चुनिएका थिए ।

तर, अध्यक्षका अर्का प्रत्यासी वोरिश मान डी भोसेले स्वीटजरल्यान्डको खेलकुद सम्बन्धी अदालतमा उजुरी हालेसँगै पुनः निर्वाचन गर्न आदेश आएको थियो । सोही अनुसार अर्मेनियाको राजधानी येरेभानमा आइतबार भएको विशेष साधारण सभामा पुनः निर्वाचन गर्नु पर्दैन भन्ने पक्षमा बहुमत आएपछि उमारले नै निरन्तरता पाएका हुन् ।

भौतिक रुपमा उपस्थित ९९ र अनलाइनबाट सहभागी भएका ५६ सदस्य राष्ट्रका प्रतिनिधिबीच फेरि चुनाव गर्ने किन नगर्ने भन्ने पक्षमा मतदान भएको थियो । उक्त निर्वाचनमा १ सय ६ राष्ट्रले पर्दैन, ३८ वटाले फेरि गर्नुपर्छ र चार मुलुकले तटस्थ बस्ने पक्षमा मतदान गरे । बाँकी सात मत बदर भएको थियो ।

करिब ७५ प्रतिशत सदस्यबाट विश्वासको मत पाएसँगै उमारले नै आइबाको आगामी चार वर्षको बागडोर सम्हाल्ने भएका छन् ।



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आईबा अध्यक्षमा पुन: उमार क्रेमलेभ दुई तिहाई बहुमतका साथ विजयी

अन्तर्राष्ट्रिय बक्सिङ संघका अध्यक्षमा रसियाका उमार क्रेमलेभ दुई तिहाई बहुमतका साथ पुन: दाेस्राे कार्यकालकाे लागि निर्वाचित भएका छन् ।  

आर्मेनियाको राजधानी येरेभानमा आज सेप्तेम्बर २४ तारिख मा सम्पन्न अन्तर्राष्ट्रिय बक्सिङ्ग संघ (आईबा) को एक्स्ट्रा अर्डीनरी कांग्रेसले उमर क्रेमलेभको लागि विश्वासको मत व्यक्त गरेकाे हाे । 

इन्टरनेशनल बक्सिङ एसोसिएसन (आईबीए) को कांग्रेसले आज अर्मेनियाको येरेभानमा भएको साधारण सभामा अध्यक्ष उमर क्रेमलेभको लागि विश्वासको मतलाई पुन: पुष्टि गरेकाे छ ।

कांग्रेसले नयाँ निर्वाचनको विपक्षमा मतदान गर्‍यो । प्रतिनिधिहरूले विपक्षमा १०६ मत खसाले, जुन ७५ % हो, १४६ योग्य राष्ट्रिय संघहरू मध्ये ३६ मत विपक्षमा र ४ राष्ट्र अनुपस्थित रहेका थिए । कांग्रेसको निर्णय अनुसार क्रेमलेभले ४ वर्षको लागि आफ्नो पदमा बहाल रहनेछन् ।

यस अघि गत मे १३–१४ तारिखसम्म टर्कीको राजधानी ईस्टानबुलमा सम्पन्न आईबा कंग्रेसबाट निर्विरोध निर्वाचित भएका आईबा अध्यक्ष उमार क्रेमलेभ बिरुद्ध हल्याण्डका अध्यक्ष पदको प्रत्यासी वोरिश मान डि.भोसेले स्वीच्जरल्याण्डको कोर्ट अफ आर्बिट्रेसन अफ स्पोर्टस (कास) मा हालेको उजुरी उपर २०२२ जुन १४ मा वोरिसलाई पनि सहभागीता गराएर निर्वाचन गर्नु भन्ने आदेश भएबाट अध्यक्ष पदको लागि पुन निर्वाचन भएकाे थियाे ।



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आईबा अध्यक्षमा पुन: उमार क्रेमलेभ दुई तिहाई बहुमतका साथ विजयी

अन्तर्राष्ट्रिय बक्सिङ संघका अध्यक्षमा रसियाका उमार क्रेमलेभ दुई तिहाई बहुमतका साथ पुन: दाेस्राे कार्यकालकाे लागि निर्वाचित भएका छन् ।  

आर्मेनियाको राजधानी येरेभानमा आज सेप्तेम्बर २४ तारिख मा सम्पन्न अन्तर्राष्ट्रिय बक्सिङ्ग संघ (आईबा) को एक्स्ट्रा अर्डीनरी कंग्रेसमा दुई तिहाई मतका साथ क्रेमलेभ निर्वाचित भएका हुन ।

प्रत्यक्ष १५५ राष्ट्र सहभागी आईबाकाे एक्स्ट्रा अर्डीनरी कंग्रेसमा भर्चुअल माध्यमबाट ५७ राष्ट सहभागी भएकाे मध्य अध्यक्षमा निर्वाचित  क्रेमलेभकाे पक्षमा फेरी चुनाब गर्नुपर्दैन भन्ने पक्षमा १०६ मत प्रत्यासी अध्यक्षका उम्मेदवार वोरिश मान डि.भोसेलेकाे पक्षमा ३८ मत, न्युटल ४ मत र ७ मत बदर भएकाे थियाे ।

यस अघि गत मे १३–१४ तारिखसम्म टर्कीको राजधानी ईस्टानबुलमा सम्पन्न आईबा कंग्रेसबाट निर्विरोध निर्वाचित भएका आईबा अध्यक्ष उमार क्रेमलेभ बिरुद्ध हल्याण्डका अध्यक्ष पदको प्रत्यासी वोरिश मान डि.भोसेले स्वीच्जरल्याण्डको कोर्ट अफ आर्बिट्रेसन अफ स्पोर्टस (कास) मा हालेको उजुरी उपर २०२२ जुन १४ मा वोरिसलाई पनि सहभागीता गराएर निर्वाचन गर्नु भन्ने आदेश भएबाट अध्यक्ष पदको लागि पुन निर्वाचन भएकाे थियाे ।

उमार क्रेमलेभ अध्यक्षमा निर्वाचित भएसंगै आईबा अध्यक्षमा क्रेमलेभ अब ४ वर्ष बाहल रहनेछन् ।



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अर्थ मन्त्री शर्माकाे लाेकप्रिय निर्णय : जनयुद्धका सहिद र बेपत्ता परिवारले मासिक तीन हजार पाउने

काठमाडौं- तत्कालीन नेकपा (माओवादी) ले सञ्चालन गरेकाे १० वर्षे जनयुद्धका सहिद तथा बेपत्ता परिवारले अब मासिक भत्ता पाउने भएका छन् ।

नेकपा (माओवादी केन्द्र) का नेता समेत रहेका अर्थमन्त्री जनार्दन शर्माले जनयुद्धका शहिद तथा बेपत्ता परिवारलाई अब मासिक भत्ता उपलब्ध गराउने मन्त्रीस्तरिय निर्णय गरेका हुन् ।

अर्थ मन्त्रालयले गृह मन्त्रालयलाई ‘राजनीतिक आन्दोलनमा बलिदान गर्ने परिवारका लागि जीवनवृत्ति वापत मासिक रकम उपलब्ध गराउनेसम्बन्धी कार्यविधिमा सहमति प्रदान गरेको छ ।

मस्यौदामा उल्लेखित ‘आन्दोलन’ को परिभाषामा ‘सम्भव २०५२ सालबाट सुरु भएको सशस्त्र द्वन्द्व र मधेस आन्दोलनलाई सम्झनुपर्छ भनि मिलाउने’ र ‘बलिदानको परिषाभामा ‘…सशस्त्र द्वन्द्व र मधेस आन्दोलनका घटनामा परी वीरगति प्राप्त गरेका भनि नेपाल सरकारबाट एकीन भई अभिलेख भएको सम्झनुपर्छ भनि मिलाउने गरी र सो क्रममा बेपत्ता पारिएका व्यक्तिहरुको परिवारलाई समेत समेट्नेगरी सहमति’ प्रदान गरिएको हो ।

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विश्व बक्सिङ संघ (आइबा) काे अध्यक्षमा उमार क्रेकलेभलाई निरन्तरता

काठमाडौं । अन्तर्राष्ट्रिय बक्सिङ संघ (आइबा)को अध्यक्षमा पुनः उमर क्रमलेभले नै निरन्तरता पाएका छन् । यसअघि मे १३–१४ मा टर्कीको इस्तानबुलमा सम्बन्न आइबाको विशेष साधारण सभाबाट उमार अध्यक्ष पदमा चुनिएका थिए ।

तर, अध्यक्षका अर्का प्रत्यासी वोरिश मान डी भोसेले स्वीटजरल्यान्डको खेलकुद सम्बन्धी अदालतमा उजुरी हालेसँगै पुनः निर्वाचन गर्न आदेश आएको थियो । सोही अनुसार अर्मेनियाको राजधानी येरेभानमा आइतबार भएको विशेष साधारण सभामा पुनः निर्वाचन गर्नु पर्दैन भन्ने पक्षमा बहुमत आएपछि उमारले नै निरन्तरता पाएका हुन् ।

भौतिक रुपमा उपस्थित ९९ र अनलाइनबाट सहभागी भएका ५६ सदस्य राष्ट्रका प्रतिनिधिबीच फेरि चुनाव गर्ने किन नगर्ने भन्ने पक्षमा मतदान भएको थियो । उक्त निर्वाचनमा १ सय ६ राष्ट्रले पर्दैन, ३८ वटाले फेरि गर्नुपर्छ र चार मुलुकले तटस्थ बस्ने पक्षमा मतदान गरे । बाँकी सात मत बदर भएको थियो ।

करिब ७५ प्रतिशत सदस्यबाट विश्वासको मत पाएसँगै उमारले नै आइबाको आगामी चार वर्षको बागडोर सम्हाल्ने भएका छन् ।

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कुनै एकदिन कुनै पुस्ताले सानुकान्छा श्रेष्ठको योगदानको इतिहास खोजी गर्नेछ ।

समाजसेवी क.सानुकान्छा श्रेष्ठ 

✍️ अनुराग अरुण 

२०५२ सालमा लुभुमा खानेपानीको साह्रै समस्या थियो । बिहान टोल टोलमा रहेको सार्वजनिक धारामा एक दुई घण्टा पानी आउँथ्यो । टोलभरिका महिलाहरु गाग्री लाइनमा लश्करै राखेर आफ्नो पालो अनुसार पानी थाप्थे । कुनैबेला पानीको लागि टोल टोलमा महिलाहरु आपसमै झगडा गरिरहेको दृश्य यदाकदा देखिन पाईन्थ्यो । कुनै टोलमा टोकन अनुसार पालैपाला पानी थाप्थे । कुनै बेला चार पाँच दिन धाराबाट पानी आउँथेन । तब मान्छेहरु साइकल, गाडी र मोटरसाइकलमा पानी राख्ने ग्यालेन लिएर लामाटार ढुगिंनसम्म पानी लिन जान्थे ।

त्यतिबेला लुभुबासीहरु नुहाउन र लुगा धुन इनारको पानी र गोदावरी खोलाको पानी प्रयोग गर्थे । चैत्र बैसाखको गर्मीमा इनारमा पानी पनि उतिसारो हुन्थिएन । नुहाउन र लुगा धुने झन समस्या थियो । एक एक थोपा पानीको अति नै अमुल्य महत्व थियो ।

तर आज अधिकांश लुभुबासीहरुको घर घरमा खानेपानीको धारा जडान भएको छ । बिहान बेलुका धारामा पानी आइरहन्छ । अब पहिले जस्तो नुहाउन, लुगाधुन र पिउन पानीको कुनै समस्था छैन । पहिले जस्तो टोल टोलमा खानेपानीको लागि झगडा गरिरहनुपर्ने अब अवस्था छैन । 

जब म पानी पिउँछु । पिउने पानीको गिलासमा क.सानुकान्छा श्रेष्ठको पसिनाले लतपतिएको अनुहार झल्झल देख्छु । यिनैको भगिरथ त्याग, तपश्या र अथक प्रयासले आज लुभुभरिमा खानेपानीको सर्व सुलभता भएको छ । अहिले लुभु खानेपानीको सञ्चालक समितिमा सबै पार्टीका मान्छेहरु सञ्चालक हुनुहुन्छ । उहाँहरु सबैलाई यो कुरा विदितै छ, लुभुमा खानेपानीको लागि सानुकान्छा श्रेष्ठले के कति गरे ? सधैं दिन रात आफै खटेका छन् । यति मात्र होइन, खानेपानीलाई आफ्नो करौडौं मुल्यपर्ने जग्गा समेत दिएका छन् ।

दु:ख लाग्छ, हामी कुनै अमुक दलका कार्यकर्ता वा मतदाता त भयौं । तर हामीमा राजनीतिको उच्च सभ्य संस्कार भएन । चेतना आएन । मलाई लाग्छ, आज नभए भोलि कुनै न कुनै एकदिन कुनै पुस्ताले क.सानुकान्छा श्रेष्ठको यो योगदानको इतिहास खोजी गर्नेछ, र त्यसको निष्पक्ष मुल्याकंन अवस्य गर्नेछ ।

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